Friday, September 30, 2022
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    रिसर्च-हिंदुस्तान में डायबिटीज के पीछे ब्रिटिशराज !

    अध्ययन बताता है कि भूख से मौत तक पहुंचते हुए ऐसे बदन अगली पीढ़ी तक जो जींस दे जाते हैं, वे जींस एक भूखे इंसान को बनाते हैं जो कि खाने को कुछ मिलते ही पेट भर लेने के चक्कर में रहते हैं।

    #Team Nirogbhav 

    इंटरनेट पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर का एक वीडियो मौजूद है जिसमें वे ब्रिटेन के एक सबसे बड़े विश्वविद्यालय में एक विषय पर वाद-विवाद करते दिख रहे हैं।

    उन्होंने ऑक्सपोर्ड विश्वविद्यालय के एक मशहूर वाद-विवाद में अपने इस तर्क को सामने रखा कि ब्रिटिश राज में किस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट किया। यह बहस 2015 में ऑक्सपोर्ड में हुई थी, जिसकी एक पुरानी गौरवशाली परंपरा है।

    लेकिन इस ब्रिटिश विश्वविद्यालय की बहस की इस गौरवशाली परंपरा वाला गौरव हिन्दुस्तान के ब्रिटिश राज में नहीं था, और अंग्रेजों ने सोच-समझकर भारत का औद्योगिकीकरण रोका और तबाह किया था ताकि भारत ब्रिटिश कारखानों के सामानों का मोहताज रहे।

    इस बहस के अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए थरूर ने एक किताब भी लिखी जिसे अंग्रेजी राज की कटु आलोचना कहा जा सकता है।

    लेकिन उस 2015 की बहस पर लिखना आज का मकसद नहीं है। अभी इसी पखवाड़े एक मेडिकल अध्ययन का नतीजा सामने रखा गया है जिसका मानना है कि आज के हिन्दुस्तानी, बांग्लादेशी, और पाकिस्तानी, डायबिटीज का अधिक खतरा रखते हैं, और इसका जिम्मेदार इस इलाके पर रहा ब्रिटिश राज है।

    इतिहास बताता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज के दौरान इन तीनों देशों के लोगों को इतने अधिक अकालों का सामना करना पड़ा कि  लोगों के बदन भूख का शिकार हो-होकर डीएनए या जींस में ऐसा फेरबदल करते चले गए कि आने वाली पीढिय़ों को जब जो खाने मिला, उन्होंने खाना शुरू कर दिया कि पता नहीं कब खाना मिलना बंद हो जाए।

    एक रिपोर्ट बतलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजी राज के शासन में 31 अकाल झेले, जिनमें से अकेले बंगाल के अकाल में 30 लाख लोग भूख से मारे गए थे।

    आज पश्चिम के एक बड़े विश्वविद्यालय के अध्ययन का नतीजा बतला रहा है कि दक्षिण एशिया के लोगों को डायबिटीज का खतरा बाकी दुनिया के मुकाबले 6 गुना अधिक है।

    यह अध्ययन बताता है कि भूख से मौत तक पहुंचते हुए ऐसे बदन अगली पीढ़ी तक जो जींस दे जाते हैं, वे जींस एक भूखे इंसान को बनाते हैं जो कि खाने को कुछ मिलते ही पेट भर लेने के चक्कर में रहते हैं।

    नतीजा यह होता है कि अमरीकियों के मुकाबले बहुत कम खाने वाले हिन्दुस्तानी भी बिना वजन अधिक हुए डायबिटीज के शिकार अधिक होते हैं।

    वैज्ञानिकों का यह निष्कर्ष है कि अविभाजित भारत के इन तीनों देशों की आबादी का बदन अपने भीतर चर्बी को बचाए रखता है, जमा करते रहता है कि जाने कब भूखे रहने की नौबत आ जाए, और उस वक्त यही चर्बी बदन को कुछ वक्त चलाने के काम आएगी, और इसी का एक नतीजा यह है कि लोग डायबिटीज के शिकार होते हैं।