Wednesday, December 1, 2021

मेदांता कीकामयाबी-बिना ब्रेन सर्जरी मरीज को दी ज़िंदगी

 पूरी आर्टरी चारों ओर से फूल गई थी ,इसे ब्रेन सर्जरी के जरिए ठीक करना संभव नहीं था। भोपाल  में डॉक्टर्स ने अपनी असमर्थता व्यक्त की क्योंकि पैर की नर्व के रास्ते ब्रेन तक पहुंचकर अंदर से इलाज करना एकमात्र तरीका है।

इंदौर। मेदांता हॉस्पिटल इंदौर ने एक बार फिर चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल की। इस बार हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने एक ऐसी सर्जरी को अंजाम दिया जिसने कई मरीजों के लिए नई राह खोल दी।

एक 55 वर्षीय व्यक्ति जिसके ब्रेन के पिछले हिस्से की वर्टिब्रल आर्टरी चारों ओर से सूजकर फट गई और खून निकल रहा था, ये सर्जरी काफी जटिल तो होती ही है और मरीज की जान बचाना बहुत मुश्किल होता है। स्पेशल प्रोसीजर (इंट्राक्रेनियल डाइसेक्टिंग एन्यूरिज़्म का एंडोस्कोपिक) के जरिए ठीक कर नई जिंदगी दी गई। मरीज अब पूरी तरह ठीक है। इसकी खास बात यह है कि बिना ब्रेन की सर्जरी इसे अंजाम दिया गया।

कालापीपल (शुजालपुर) निवासी किसान मोहनलाल पाटीदार का है। वे एक महीने पहले अचानक बेहोश हो गए। करीब आधे घंटे बाद होश आया और संभल पाते उसके पहले चक्कर आने के साथ गर्दन में जकड़न महसूस हुई और उल्टियां भी होने लगी।

परिजन उन्हें लेकर इलाज के लिए भोपाल के हॉस्पिटल पहुंचे और जांच करवाई गई। इसमें पता लगा कि उनके ब्रेन के पिछले हिस्से की वर्टिब्रल आर्टरी चारों ओर से सूजकर फट गई और खून निकल रहा था। इसे मेडिकल की भाषा में डाइसेक्टिंग एन्युरिज़्म कहते हैं।

भोपाल के डॉक्टर्स ने सर्जरी से जताई थी असमर्थता

हॉस्पिटल की न्यूरोइंटरवेंशन, न्यरोरेडियोलॉजिटस्ट डॉ. स्वाति चिन्चुरे ने बताया कि वर्टिब्रल आर्टरी ब्रेन के ठीक बीच में से गुजरती है इसलिए यह हमारे नर्वस सिस्टम का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। भोपाल में कई न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाने के बावजूद उनका इलाज संभव नहीं हो पाया क्योंकि उन्हें पोस्टेरिअल सर्कुलेशन में यानी ब्रेन के पिछले हिस्से में एन्युरिज़्म हुआ था और ओपन सर्जरी में वहां तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता है।

दूसरी परेशानी यह थी कि पूरी आर्टरी चारों ओर से फूल गई थी इसलिए इसे ब्रेन सर्जरी के जरिए ठीक करना संभव नहीं था। भोपाल में इस बीमारी का इलाज करने में डॉक्टर्स ने अपनी असमर्थता व्यक्त की क्योंकि ऐसी बीमारी में पैर की नर्व के रास्ते ब्रेन तक पहुंचकर अंदर से इलाज करना ही एकमात्र तरीका है।

‘Pipe within Pipe’ प्रोसीजर को अपनाया -डॉ. स्वाति

डॉ. स्वाति चिन्चुरे ने इलाज की प्रोसीजर के बारे में बताया कि हमने मरीज की ब्रेन एंजियोग्राफी कर स्थिति को बेहतर ढंग से समझा। मरीज मोहनलाल को 1 अक्टूबर को एडमिट किया गया था।

इसके बाद एनेस्थेटिशियन डॉ. जाकिर हुसैन ने स्पेशल प्लान व प्रोजीजर से उन्हें एनेस्थेशिया दिया। फिर डॉक्टरों की टीम ने P-64 नामक एक Special Flow Diverter को ‘Pipe within Pipe’ तकनीक से खराब आर्टरी के अंदर डाला। इससे खून का प्रवाह खराब आर्टरी बजाए डायवर्ट होकर अच्छी आर्टरी में होने लगा।

इस इंडोवेस्कुलर प्रोसेस को पूरा करने के सिर्फ पांच दिनों बाद ही मरीज को पूरी तरह से ठीक होने के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया। अब वह फॉलोअप में है और पूरी तरह ठीक है। खुद मरीज मोहनलाल ने बताया कि उन्हें अब किसी तरह की परेशानी नहीं है।

प्रदेश में पहली सर्जरी

P-64 नामक इस Speical Flow Diverter को कुछ दिन पहले ही देश में लांच किया गया है और सिर्फ कुछ बड़े शहरों में ही इसका सफल प्रयोग किया गया है। मध्यप्रदेश में पहली बार मेदांता अस्पताल, इंदौर में ही P-64 Speical Flow Diverter के जरिए किसी मरीज का सफल इलाज किया गया है।

खून का बहाव ज्यादा होने से 25 फीसदी मरीज बच नहीं पाते

डॉ. स्वाति ने ब्रेन एन्युरिज़्म में सेलेब्रल एन्युरिज़्म (यानी खून की नली का गुब्बारा) के बारे में बताया कि इस बीमारी में यह आर्टरी की दीवार के कमजोर क्षेत्र में उभरता है। यह गुब्बारा फटने पर ब्रेन में खून का बहाव यानि इंट्राक्राइनल हेमरेज होता है।

ब्रेन में खून का बहाव होने से स्ट्रोक, कोमा और लकवा हो सकता है। परेशानी बढ़ने पर मरीज की मौत भी हो सकती है। लगभग 25 फीसी मरीज इसमें बच नहीं पाते और अगले 24 घंटों में ही उनकी मौत हो जाती है। ऐसे 30 फीसदी मरीज अगले 6 महीनों में इस बीमारी की गंभीरता से मरते हैं। इस बीमारी का जल्द से जल्द पता लगने और सही इलाज मिलने पर मरीज की जान बच सकती है।

 

इन लोगों को ज्यादा खतरा

धूम्रपान : इससे न सिर्फ एन्युरिज़्म बनने का खतरा होता है बल्कि इसके फटने से हेमरेज की आशंका भी बढ़ जाती है।

हाई ब्लड प्रेशर : इससे आर्टरी की दीवार कमजोर हो जाती और यह एन्युरिज़्म बन जाता है।

फेमिली हिस्ट्री : यदि किसी के परिवार में 2 लोगों से ज्यादा लोगों को यह समस्या है तो इसके अगली पीढ़ी में आने की आशंका बढ़ जाती है।

 

प्रोसीजर की ख़ास बातें

– इस बीमारी का इलाज बिना सर्जरी के पैर की आर्टरी से शुरू किया जाता है। इसमें हार्ट को बिना टच किए ब्रेन के अंदर तक किया जाता है।

– सारी प्रोसीजर स्क्रीन के माध्यम से डिजीटल रूप से स्पष्ट देखी जा सकती है।

– पहले यह तकनीक अमेरिका में थी, अब करीब 10 सालों से देश में है लेकिन बहुत कम अपनाई जाती है।

– ब्रेन के पीछे आर्टरी फटने से रिस्क बहुत बढ़ जाती है इसलिए सर्जरी के मरीज बहुत कम बच पाते हैं

– यह बीमारी महिलाओं में ज्यादा हो सकती है क्योंकि उनमें स्ट्रोजर नामक हार्मोन होता है तो आर्टरी को कमजोर करते हैं।

– इसके इलाज का खर्चा 9 से 10 लाख रु. में होता है क्योंकि इसमें स्टेंट सहित प्रोसीजर में लगने वाले मेडिकल सामग्री काफी महंगी होती है।

– इसका इलाज आयुष्मान योजना में नहीं है। मरीज मोहनलाल को मुख्यमंत्री राहत कोष से जरूर इसमें 75 हजार रु. की मदद मिली है।

 

 

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